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Monday, September 1, 2014
Saturday, August 30, 2014
बेबाक
वो लिखती है बेबाक
पूरे धडल्ले से वो
पूरे धडल्ले से वो
कह जाती है ,
सारी बातें,जिन्हे
हम कहने से कतराते है
या टाल जाते हैं......
सारी बातें,जिन्हे
हम कहने से कतराते है
या टाल जाते हैं......
वो बिल्कुल भी नही
हिचकिचाती
अपने अंतर्मन की सारी
कथा कह जाती..!
अपने अंतर्मन की सारी
कथा कह जाती..!
हम सोचने लगते है,
कहे ना कहे,
तब कलम भी
चलती है रूक रूक के
और शब्द भी
नही बांधं पाते
एक दूसरे को...
कहे ना कहे,
तब कलम भी
चलती है रूक रूक के
और शब्द भी
नही बांधं पाते
एक दूसरे को...
कुछ देर बाद हम खुद ही
भूल जाते हैं कि
हमें...कहना
क्या था ...
भूल जाते हैं कि
हमें...कहना
क्या था ...
बाते रफा दफा हो
जाती हैं,पर अंकित
रह जाती हैं,गहरे मे कहीं
दिलो दिमाग के अंदर !
जाती हैं,पर अंकित
रह जाती हैं,गहरे मे कहीं
दिलो दिमाग के अंदर !
पता है.....,
बदन पर कभी कभी
जो फुंसियॉ उभर आती हैं
वे उन्ही अंनकहे बातो की
निशानी है,.....
जिन्हे दबा चुके होते हैं
हम गहराई मे....
बदन पर कभी कभी
जो फुंसियॉ उभर आती हैं
वे उन्ही अंनकहे बातो की
निशानी है,.....
जिन्हे दबा चुके होते हैं
हम गहराई मे....
उन्ही फुंसियों को,
फिर अपने ही नख से नोंच कर
हम बना डालते हैं घाव...
जिंनकी टीस उठती रहती
है ताउमर....
>>>>>>>>>>>
फिर अपने ही नख से नोंच कर
हम बना डालते हैं घाव...
जिंनकी टीस उठती रहती
है ताउमर....
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सीमा
Friday, August 29, 2014
Wednesday, August 27, 2014
क्यों नहीं
व्रत त्योहार
क्यों नही रखते
पति अपनी पत्नियों
के लिए व्रत,
क्यों नही बनाये जाते
पतियों के लिए कुछ
व्रत ,त्यौहार ,नियम
जिन्हे वो कर सकें
अपनी पत्नियों के लिए
शायद इसीलिए कि
औरतों को ही सिर्फ
सहना सिखाया जाता है
मर्दों को कहाँ कोई नियम
पढ़ाया जाता है
और औरतें भी
ख़ुशी ख़ुशी हर
नियम का पालन
करती हैं और
सदियों तक इन्हीं
परम्पराओं में
अपना अस्तित्व
ढूंढती रहती हैं
सीमा श्रीवास्तव
क्यों नही रखते
पति अपनी पत्नियों
के लिए व्रत,
क्यों नही बनाये जाते
पतियों के लिए कुछ
व्रत ,त्यौहार ,नियम
जिन्हे वो कर सकें
अपनी पत्नियों के लिए
शायद इसीलिए कि
औरतों को ही सिर्फ
सहना सिखाया जाता है
मर्दों को कहाँ कोई नियम
पढ़ाया जाता है
और औरतें भी
ख़ुशी ख़ुशी हर
नियम का पालन
करती हैं औरसदियों तक इन्हीं
परम्पराओं में
अपना अस्तित्व
ढूंढती रहती हैं
सीमा श्रीवास्तव
Monday, August 25, 2014
Sunday, July 27, 2014
मुझे कुछ कहना है!
आकाश का यूँ बदला-बदला रंग क्यों है ?
आदमी का यूँ बदला-बदला ढंग क्यों है ?
जज्बातों पर हर पल इतना बंध क्यों है ?
फिज़ाओं में हर पल बारूदी गंध क्यों है ?
हाथों में निवालों के बदले संग क्यों है ?
भूख की खातिर ज़िंदगी में जंग क्यों है ?
जो जवाबदार है इन कोहपैकर सवालों के -
उनसे मुझे कुछ कहना है !
मुझे कुछ कहना है।
(संग = पत्थर, कोहपैकर = भीमकाय, विशाल.)
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