Wednesday, February 24, 2016

नजर

सबने अपनी -अपनी
नजर उतार कर
उस चौराहे पर फेंकी थी !
मैं उसी चौराहे से
गुजर गई थी शायद!!
- सीमा

वसंत

    वसंत
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 वसंत तो तब होता
जब मेरा
बागीचा
वसंती फूलों से
गुलज़ार होता।
वसंत तो तब होता
जब सरसों के खेतों से
आती हवाएँ मुझे छेड़ जाती ।
इस बार वसंत आकर
यूँ ही चला जाएगा
कि पिछले महीने
मैंने गमलों में नहीं लगाए
अपनी पसंद के फूल ।
कि इन दिनों मैं
ईंट -पत्थरों में
उलझ कर रह,
गई थी।
सुनो वसंत,
मैं अगले वर्ष
तुम्हारा स्वागत करूँगी
ढेर सारे फूलों और
खुशबुओं के साथ ।
- सीमा

गुलाब

और सारे गुलाब डंठलों से चुपचाप उतर गए कि उन्हें प्रेम की एक बेहतरीन तस्वीर बनना था । कि उन्हें इंसान के हाथों की गरमी को महसूस करना था।
- सीमा

लोरी


कितनी बार
हम खुद को
बचपन की वह
चंदा मामा की
लोरी गा कर 
बहलाते हैं ,
कितनी बार
प्यालियाँ टूटती हैं
और हम कभी
खुद को और
कभी दूसरों को
नई प्यालियों का
वास्ता देकर
फुसलाते हैं।
इस दुनिया में
प्यालियों का
टूटना लगा ही
रहता है।
कभी हम समझ,जाते हैं,
कभी हम जिद पर अड़ जाते है!!
- सीमा

ढाई ही अक्षर

छिपा है प्यार जिसमें वो
हैं सिर्फ ढाई ही अक्षर,
बसा था दिल में तेरे जो
वो थे ये ढाई ही अक्षर।
बहक के जब जुबां से
शब्द कुछ ज्यादा निकल गए,
तमाशा बन गए देखो
फिर वही ढाई ये अक्षर ।
जमा कर लो
मुहब्बत की
इस मीठी जुबानी को
देगें राहत दर्द में
हमारे ढाई ये अक्षर ।
- सीमा

Tuesday, February 23, 2016

एक बार फिर

एक बार फिर
कुछ संकरे से रास्ते
मेरे पास चल के आए हैं
संभावनाएं खटखटा रही हैं 
दरवाजे
पर इन गलियों से जुड़ी सड़क
मुझे डराती है।
कि वहाँ कोई भी ठोकरें मार के
आराम से
निकल जाता है ।
मैंने अक्सर
चोट खाए लोगों को
इन गलियों में सिसकते देखा है !!
-सीमा

लहर

वो अक्सर
तोड़ देती है
रेत के घर
लहरों को
अपनी धुन में
दिखता ही
कहाँ कुछ!!
- सीमा