तुम्हारे खत कभी पुराने नहीं दिखते
उनकी खुशबू भी कागजी नहीं बिल्कुल
कुछ खत इत्र की मानिंद महकते हैं!
- सीमा
बैठे ,बैठे अचानक याद आ गया वह खेल
जिसमें हम लकीरें खींच आते थे
अलग- अलग जगहों पर
और फिर शुरू होती थी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
खोजने की बारी ।
जो जितना कम समय लगाता खोजने में
वो जीत जाता ।
हम सभी जल्दी ,जल्दी काटते थे
एक ,दूसरे की खींची लकीरें !
ये लकीरों को काटना
सचमुच खेल था या
इसमे छिपी थी कोई सच्चाई ।
कहीं ना कहीं हम सभी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
काटते नहीं रहते क्या और
कभी-कभी कुछ
खींची हुई लकीरों के पार भी
जाना चाहते हैं कुछ लोग खेलते-खेलते।
- सीमा श्रीवास्तव
उसका ना होना होने सा था
और उसका होना ना होने सा !
कभी -कभी ना होना ज्यादा मायने रखता है
हो जाने से ।
संभावनाओं की
एक पूरी जमीन होती है तब
और ख्यालों का समूचा आसमान
और तब तक हो जाना
ना होने को
चुनौतियाँ देता है!
- सीमा
कभी -कभी
खुद की अपूर्णता से
हम अजीब सा भारीपन
महसूस करते हैं।
एक मक्के का पौधा भी
कितना अपूर्ण होता है ना
जब तक उसकी देह पर
दाने नहीं जम जाते।
वह तब तक अपने
खालीपन को झेलता है
जब तक वह ठोस
भुट्टे की शक्ल नहीं ले लेता
और तब वह भारी हो कर भी
खुद को बहुत हल्का पाता है
कि उसे पूर्णता जो मिल जाती है।
- सीमा