Sunday, February 5, 2017

खत

तुम्हारे खत कभी पुराने नहीं दिखते
उनकी खुशबू भी कागजी नहीं बिल्कुल

कुछ खत इत्र की मानिंद महकते हैं!
- सीमा

चाहत

चाहतों का समंदर
सो गया है कहीं
बस नदी सी
अब बहना
चाहती हूँ।

- सीमा

Saturday, February 4, 2017

अक्स

हाथ से छूटा आईना और गिर गया देखो
अक्स था मेरा जो उसमें कैसे बिखर गया देखो!
   

Thursday, February 2, 2017

लकीरें

बैठे ,बैठे अचानक याद आ गया वह खेल

जिसमें हम लकीरें खींच आते थे
अलग- अलग  जगहों पर

और फिर शुरू होती थी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
खोजने की बारी ।
जो जितना कम समय लगाता खोजने में
वो जीत जाता ।

हम सभी जल्दी ,जल्दी   काटते थे
एक ,दूसरे की खींची लकीरें !

ये लकीरों को काटना
सचमुच  खेल था या
इसमे छिपी थी कोई  सच्चाई ।

कहीं ना कहीं हम सभी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
काटते नहीं रहते क्या और
कभी-कभी कुछ
खींची हुई लकीरों के पार भी
जाना चाहते हैं कुछ लोग खेलते-खेलते।

- सीमा श्रीवास्तव

Wednesday, February 1, 2017

उसका होना


उसका ना  होना होने सा था
और उसका होना ना होने सा !
कभी -कभी ना होना ज्यादा मायने रखता है
हो जाने से ।
संभावनाओं की
एक पूरी जमीन होती है तब
और ख्यालों का समूचा आसमान
और तब तक हो जाना
ना  होने को
चुनौतियाँ देता है!

- सीमा

Sunday, January 29, 2017

अपूर्णता

कभी -कभी
खुद की अपूर्णता से
हम अजीब सा भारीपन
महसूस करते हैं।

एक मक्के का पौधा भी
कितना अपूर्ण होता है ना
जब तक उसकी देह पर
दाने नहीं जम जाते।
वह तब तक अपने
खालीपन को झेलता है
जब तक वह  ठोस
भुट्टे की शक्ल नहीं ले लेता
और तब वह भारी हो कर भी
खुद को बहुत हल्का पाता है
कि उसे पूर्णता जो मिल जाती है।
- सीमा

Thursday, January 26, 2017

जिंदगी

उसके खूबसूरत अल्फाजों से

    वह रंग रही थी जिंदगी

निखर रही थी, संवर रही थी

   जी रही थी जिंदगी!